बजरंग बाण का अर्थ
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प्रत्येक दोहे और चौपाई का अर्थ अलग-अलग समझाया गया है।
॥ प्रारंभिक दोहे का अर्थ ॥
निश्चय प्रेम प्रतीति ते, बिनय करैं सनमान।
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥
आरंभिक दोहे में भक्त के भाव का वर्णन है। जो दृढ़ प्रेम, विश्वास और विनम्र आदर के साथ हनुमान जी की प्रार्थना करते हैं, उनके सभी शुभ कार्य हनुमान जी पूर्ण करते हैं।
📜 चौपाई 1
जय हनुमंत संत हितकारी। सुन लीजै प्रभु अरज हमारी॥ १ ॥
अर्थ: हनुमान जी संतों और भक्तों के हितकारी हैं। हे प्रभु, कृपया हमारी विनम्र प्रार्थना सुन लीजिए।
📜 चौपाई 2
जन के काज बिलंब न कीजै। आतुर दौरि महा सुख दीजै॥ २ ॥
अर्थ: अपने भक्त के कार्य में देर न कीजिए। शीघ्र दौड़कर आइए और महान सुख प्रदान कीजिए।
📜 चौपाई 3
जैसे कूदि सिंधु महिपारा। सुरसा बदन पैठि बिस्तारा॥ ३ ॥
अर्थ: जिस प्रकार आप समुद्र को लाँघकर उसके दूसरे तट पर पहुँचे और अपने रूप का विस्तार करते हुए सुरसा के मुख में प्रविष्ट हुए, उसी प्रकार अपने भक्त की सहायता के लिए आइए। (यह चौपाई रामायण में हनुमान जी की लंका-यात्रा का स्मरण कराती है।)
📜 चौपाई 4
आगे जाय लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुरलोका॥ ४ ॥
अर्थ: आगे जाने पर जब लंकिनी ने रोका, तब आपने उसे लात मारी और वह देवलोक को चली गई।
📜 चौपाई 5
जाय बिभीषन को सुख दीन्हा। सीता निरखि परमपद लीन्हा॥ ५ ॥
अर्थ: आपने जाकर विभीषण को सुख दिया और माता सीता के दर्शन करके अपने कार्य की परम सिद्धि प्राप्त की।
📜 चौपाई 6
बाग उजारि सिंधु महँ बोरा। अति आतुर जमकातर तोरा॥ ६ ॥
अर्थ: हनुमान जी ने लंका की वाटिका उजाड़ दी और अत्यंत शीघ्रता से, भय से काँपती राक्षस सेना को परास्त कर दिया। (इस पंक्ति का अर्थ टीकाकार कुछ भिन्न रूपों में करते हैं।)
📜 चौपाई 7
अक्षय कुमार मारि संहारा। लूम लपेटि लंक को जारा॥ ७ ॥
अर्थ: आपने अक्षय कुमार का वध किया और अपनी पूँछ से लंका को जला दिया।
📜 चौपाई 8
लाह समान लंक जरि गई। जय जय धुनि सुरपुर नभ भई॥ ८ ॥
अर्थ: लंका लाख की तरह तुरंत जल गई और देवलोक के आकाश में जय-जयकार की ध्वनि गूँज उठी।
📜 चौपाई 9
अब बिलंब केहि कारन स्वामी। कृपा करहु उर अंतर्यामी॥ ९ ॥
अर्थ: हे स्वामी, अब देर किस कारण से? हे सबके हृदय की बात जानने वाले अंतर्यामी, कृपा कीजिए।
📜 चौपाई 10
जय जय लखन प्राण के दाता। आतुर ह्वै दुःख करहु निपाता॥ १० ॥
अर्थ: लक्ष्मण को प्राणदान देने वाले, आपकी जय हो। शीघ्र आकर मेरे दुःख का अंत कीजिए।
📜 चौपाई 11
जै गिरिधर जै जै सुख सागर। सुर-समूह-समरथ भटनागर॥ ११ ॥
अर्थ: पर्वत धारण करने वाले, सुख के सागर, वीरों में श्रेष्ठ और देवताओं के समूह की सहायता करने में समर्थ हनुमान जी की जय हो।
📜 चौपाई 12
ॐ हनु हनु हनु हनुमंत हठीले। बैरिहि मारु बज्र की कीले॥ १२ ॥
अर्थ: ॐ। हे हठीले (दृढ़ संकल्प वाले) हनुमान, शत्रु पर वज्र की कील के समान प्रहार कीजिए।
📜 चौपाई 13
गदा बज्र लै बैरिहिं मारो। महाराज प्रभु दास उबारो॥ १३ ॥
अर्थ: अपनी गदा और वज्र लेकर शत्रुओं का संहार कीजिए। हे महाराज प्रभु, अपने दास का उद्धार कीजिए।
📜 चौपाई 14
ॐकार हुंकार महाप्रभु धावो। बज्र गदा हनु बिलंब न लावो॥ १४ ॥
अर्थ: ॐकार और हुंकार के साथ, हे महाप्रभु, दौड़कर आइए। हे हनुमान, वज्र और गदा लेकर देर न कीजिए।
📜 चौपाई 15
ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हनुमंत कपीशा। ॐ हुं हुं हुं हनु अरि उर शीशा॥ १५ ॥
अर्थ: बीज-अक्षरों के द्वारा वानरराज हनुमान जी का आवाहन किया गया है। भक्त उनसे शत्रु पर प्रहार करने की प्रार्थना करता है।
📜 चौपाई 16
सत्य होहु हरि शपथ पायके। रामदूत धरु मारु जाय के॥ १६ ॥
अर्थ: श्रीहरि (श्रीराम) की शपथ से यह प्रार्थना सत्य हो। हे रामदूत, जाकर शत्रु को पकड़िए और उस पर प्रहार कीजिए।
📜 चौपाई 17
जय जय जय हनुमंत अगाधा। दुःख पावत जन केहि अपराधा॥ १७ ॥
अर्थ: अथाह सामर्थ्य वाले हनुमान जी की जय हो। आपका भक्त किस अपराध के कारण दुःख पा रहा है?
📜 चौपाई 18
पूजा जप तप नेम अचारा। नहिं जानत कछु दास तुम्हारा॥ १८ ॥
अर्थ: आपका यह दास पूजा, जप, तप, नियम और आचार कुछ भी नहीं जानता। भक्त केवल विनम्रता के साथ आपकी शरण में आता है।
📜 चौपाई 19
बन उपबन मग गिरि गृह माहीं। तुमरे बल हम डरपत नाहीं॥ १९ ॥
अर्थ: वन, उपवन, मार्ग, पर्वत या घर, कहीं भी हमें भय नहीं लगता, क्योंकि हमें आपके बल का भरोसा है।
📜 चौपाई 20
पाय परौं कर जोरि मनावौं। यह अवसर अब केहि गोहरावौं॥ २० ॥
अर्थ: मैं आपके चरणों में गिरकर हाथ जोड़कर विनती करता हूँ। इस समय आपके सिवा और किसे पुकारूँ?
📜 चौपाई 21
जय अंजनि कुमार बलवंता। शंकर सुवन बीर हनुमंता॥ २१ ॥
अर्थ: अंजनि के बलवान पुत्र, शंकर के पुत्र माने जाने वाले वीर हनुमान जी की जय हो।
📜 चौपाई 22
बदन कराल काल कुल घालक। राम सहाय सदा प्रतिपालक॥ २२ ॥
अर्थ: विकराल रूप वाले, मृत्यु की शक्तियों के समूह का नाश करने वाले, श्रीराम के सहायक और सदा रक्षक।
📜 चौपाई 23
भूत प्रेत पिशाच निशाचर। अग्नि बैताल काल मारीमर॥ २३ ॥
अर्थ: भूत, प्रेत, पिशाच, निशाचर, अग्नि, बैताल, काल और महामारी। इस पंक्ति में उन अनेक भयों का उल्लेख है जिनसे भक्त रक्षा चाहता है।
📜 चौपाई 24
इन्हें मारु, तोहि शपथ राम की। राखु नाथ मरजाद नाम की॥ २४ ॥
अर्थ: श्रीराम की शपथ देकर प्रार्थना है कि इनका संहार कीजिए। हे नाथ, अपने नाम की मर्यादा की रक्षा कीजिए।
📜 चौपाई 25
जनकसुता हरि दास कहावौ। ताकी शपथ बिलंब न लावौ॥ २५ ॥
अर्थ: आप जानकी जी (सीता) और हरि (श्रीराम) के दास कहलाते हैं। उनकी शपथ है, विलंब न कीजिए।
📜 चौपाई 26
जै जै जै धुनि होत अकासा। सुमिरत होय दुसह दुःख नासा॥ २६ ॥
अर्थ: आकाश में जय-जयकार की ध्वनि हो रही है और हनुमान जी का स्मरण करने से असहनीय दुःख का नाश हो जाता है।
📜 चौपाई 27
चरन पकरि कर जोरि मनावौं। यह अवसर अब केहि गोहरावौं॥ २७ ॥
अर्थ: आपके चरण पकड़कर हाथ जोड़कर विनती करता हूँ। इस समय आपके सिवा और किसे पुकारूँ?
📜 चौपाई 28
उठु, उठु, चलु, तोहि राम दुहाई। पाँय परौं, कर जोरि मनाई॥ २८ ॥
अर्थ: उठिए, उठिए, चलिए! आपको श्रीराम की दुहाई है। मैं आपके चरणों में गिरकर हाथ जोड़कर विनती करता हूँ।
📜 चौपाई 29
ॐ चं चं चं चं चपल चलंता। ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमंता॥ २९ ॥
अर्थ: बीज-अक्षरों का उच्चारण करते हुए भक्त शीघ्रगामी हनुमान जी को बार-बार पुकारता है।
📜 चौपाई 30
ॐ हं हं हाँक देत कपि चंचल। ॐ सं सं सहमि पराने खल दल॥ ३० ॥
अर्थ: फुर्तीले हनुमान जी अपनी गर्जना करते हैं और उसे सुनकर दुष्टों के दल भयभीत होकर भाग जाते हैं।
📜 चौपाई 31
अपने जन को तुरत उबारो। सुमिरत होय आनंद हमारो॥ ३१ ॥
अर्थ: अपने भक्त का तुरंत उद्धार कीजिए। आपका स्मरण करते हुए हमें आनंद प्राप्त हो।
📜 चौपाई 32
यह बजरंग बाण जेहि मारो। ताहि कहो फिरि कौन उबारो॥ ३२ ॥
अर्थ: यह बजरंग बाण जिसे लगे, बताइए, उसे फिर कौन बचा सकता है? यह पंक्ति हनुमान जी की रक्षक शक्ति में भक्त के विश्वास को प्रकट करती है।
📜 चौपाई 33
पाठ करै बजरंग बाण की। हनुमत रक्षा करै प्रान की॥ ३३ ॥
अर्थ: जो बजरंग बाण का पाठ करता है, हनुमान जी उसके प्राणों की रक्षा करते हैं।
📜 चौपाई 34
यह बजरंग बाण जो जापै। तेहि ते भूत प्रेत सब काँपै॥ ३४ ॥
अर्थ: जो इस बजरंग बाण का जप करता है, उससे भूत-प्रेत सब काँपते हैं और दूर रहते हैं।
📜 चौपाई 35
धूप देय अरु जपै हमेशा। ताके तन नहिं रहै कलेशा॥ ३५ ॥
अर्थ: परंपरागत मान्यता है कि जो धूप अर्पित करके सदा इसका जप करता है, उसके शरीर में कष्ट नहीं रहता।
॥ समापन दोहे का अर्थ ॥
प्रेम प्रतीतिहि कपि भजै, सदा धरै उर ध्यान।
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥
अर्थ: समापन दोहा आरंभिक दोहे के वचन को दोहराता है: जो प्रेम और विश्वास के साथ हनुमान जी का भजन करता है और उन्हें सदा हृदय में धारण करता है, उसके सभी शुभ कार्य हनुमान जी सिद्ध करते हैं।
बजरंग बाण
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